Kota History

श्री मथुराधीश जी का कोटा आगमन | कोटा का इतिहास | हाड़ौती की आस्था - भाग 1

सन् 1738 में श्री मथुराधीश जी का विग्रह कोटा कैसे आय�...

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श्री मथुराधीश जी का कोटा आगमन | कोटा का इतिहास | हाड़ौती की आस्था - भाग 1

Table of Contents

  1. 1. पृष्ठभूमि — कोटा और वल्लभ संप्रदाय
  2. 2. ब्रजनाथ जी — उससे पहले की कहानी
  3. 3. श्री मथुराधीश जी का कोटा आगमन — पूरी कहानी
    • घटनाक्रम — करनावल से कोटा तक
  4. 4. राय द्वारकादास जी — वह भक्त जिन्होंने हवेली दे दी
  5. 5. महत्व — कोटा क्यों बना तीर्थ?
    • नाथद्वारा महोत्सव — और भी बड़ी भक्ति
  6. 6. मंदिर का ऐतिहासिक महत्व — 1857 की घटना

"कोटा में एक ऐसा मंदिर है — जहाँ भगवान खुद मेहमान बनकर आए, और फिर यहीं के हो गए।"

1738 स्थापना वर्ष
(संवत् 1801)
करनावल मूल ग्राम,
मथुरा के पास
12,000 बीघा जागीर
मंदिर हेतु
राय द्वारकादास जिन्होंने हवेली
भेंट की

पृष्ठभूमि — कोटा और वल्लभ संप्रदाय

18वीं सदी का कोटा

18वीं सदी का कोटा केवल एक राजनीतिक केंद्र नहीं था — यह धर्म, भक्ति और संस्कृति का भी केंद्र बनता जा रहा था। महाराव भीमसिंहजी के समय से ही यहाँ वल्लभ संप्रदाय की जड़ें पकड़ने लगी थीं।

भीमसिंहजी ने कोटा के किले में ब्रजनाथ जी का मंदिर बनवाया था। उनकी भक्ति इतनी गहरी थी कि वे युद्ध में भी अपने आराध्य का विग्रह साथ ले जाते थे। कोटा में वैष्णव भक्ति की यह परंपरा उनके पुत्र महाराव दुर्जनशालजी के समय में अपने चरम पर पहुँची।

वल्लभ संप्रदाय क्या है?

वल्लभ संप्रदाय — जिसे शुद्धाद्वैत संप्रदाय भी कहते हैं — की स्थापना 15वीं सदी में महाप्रभु वल्लभाचार्य जी ने की थी। इस संप्रदाय में श्रीकृष्ण की पुष्टिमार्गीय भक्ति का विशेष महत्व है। राजस्थान और गुजरात में इस संप्रदाय के लाखों अनुयायी हैं।

हाड़ौती की आस्था — श्री मथुराधीश जी का कोटा आगमन
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श्री मथुराधीश जी का कोटा आगमन

ब्रजनाथ जी — उससे पहले की कहानी

श्री मथुराधीश जी के कोटा आगमन को पूरी तरह समझने के लिए पहले ब्रजनाथ जी की कहानी जाननी ज़रूरी है — क्योंकि इन दोनों की कहानियाँ एक-दूसरे से जुड़ी हैं।

महाराव भीमसिंहजी के काल में, जब वे चिंकुलीखान के विरुद्ध युद्धरत थे, उन्होंने वीरगति प्राप्त की। युद्ध में उनका हाथी — और उस पर विराजमान ब्रजनाथ जी का विग्रह — निज़ाम-उल-मुल्क की सेना के हाथ लग गया।

ऐतिहासिक तथ्य

हैदराबाद के एक वणिक ने चिंकुलीखान से ब्रजनाथ जी का विग्रह प्राप्त कर मंदिर बनवाया। जब महाराव दुर्जनशालजी सत्तारूढ़ हुए, उन्होंने दीवान व्यास द्वारकादास को हैदराबाद भेजा। उस दयालु वणिक ने विग्रह सहर्ष लौटा दिया।

महाराव दुर्जनशालजी ने ब्रजनाथ जी का स्वागत अपनी राजधानी से 25 मील दूर जाकर किया और भव्य शोभायात्रा के साथ कोटा लाए। यह घटना उनकी भक्ति की गहराई को दर्शाती है।

श्री मथुराधीश जी का कोटा आगमन — पूरी कहानी

संवत् 1801 (सन् 1738 ई.) में बुंदी पर विजय के बाद, महाराव दुर्जनशालजी ने एक और महत्वपूर्ण कदम उठाया — श्री मथुराधीश जी (मथुरानाथ जी) का विग्रह कोटा लाना।

यह विग्रह मूलतः मथुरा के समीप करनावल ग्राम से आया था। डॉ. मथुरालाल शर्मा की पुस्तक "कोटा राज्य का इतिहास" के अनुसार यह विग्रह बुंदी होते हुए कोटा पहुँचा।

"महाराव दुर्जनशालजी ने मथुराधीश जी का स्वागत उसी शिष्टाचार से किया —
जैसे एक राजा, किसी दूसरे राजा का स्वागत करता है।"

घटनाक्रम — करनावल से कोटा तक

  • 1
    करनावल ग्राम, मथुरा

    श्री मथुराधीश जी का मूल विग्रह मथुरा के समीप करनावल ग्राम में विराजमान था। यह वल्लभ संप्रदाय का एक महत्वपूर्ण विग्रह था।

  • 2
    बुंदी विजय के बाद — संवत् 1801

    महाराव दुर्जनशालजी की बुंदी पर विजय के बाद यह विग्रह कोटा लाने का निर्णय हुआ। यह संवत् 1801 अर्थात् सन् 1738 की घटना है।

  • 3
    राजकीय स्वागत — नगर से बाहर

    महाराव दुर्जनशालजी ने स्वयं नगर से बाहर जाकर राजकीय सम्मान के साथ स्वागत किया — ठीक वैसे जैसे एक राजा, किसी आगंतुक राजा का स्वागत करता है। पूरे नगर ने बड़े समारोह के साथ उनका स्वागत किया।

  • 4
    राय द्वारकादास जी की अनुपम भेंट

    महाराव के दीवान — राय द्वारकादास जी — जो महाराव रामसिंहजी के समय से मंत्री थे और परम भक्त थे, उन्होंने श्री मथुराधीश जी के सम्मान में अपनी पूरी हवेली भगवान को समर्पित कर दी। यही वह स्थान है जहाँ आज भी मंदिर स्थित है।

  • 5
    12,000 बीघा जागीर — राज्य की ओर से

    महाराव दुर्जनशालजी ने मंदिर के नित्य सेवा-पूजन और खर्च हेतु राज्य की ओर से 12,000 बीघा की जागीर प्रदान की। यह एक अत्यंत उदार दान था।

  • 6
    कोटा बना वैष्णव तीर्थ

    श्री मथुराधीश जी के आगमन के बाद से कोटा — वल्लभ मत के अनुयायी वैष्णवों का एक प्रमुख तीर्थस्थल बन गया। दुर्जनशालजी की भक्ति से प्रेरित होकर कोटा राज्य के अनेक धनाढ्य व्यक्तियों ने वल्लभ मत अपनाया और मंदिर बनवाए।

राय द्वारकादास जी — वह भक्त जिन्होंने हवेली दे दी

इस पूरी कहानी में सबसे प्रेरणास्पद पात्र हैं — दीवान राय द्वारकादास जी। वे न केवल एक कुशल प्रशासक थे, बल्कि एक सच्चे वैष्णव भक्त भी थे।

  • राय द्वारकादास जी महाराव रामसिंहजी के समय से कोटा दरबार में मंत्री के पद पर थे — अर्थात् वे कई दशकों से राज्य की सेवा कर रहे थे।
  • उन्होंने अपनी व्यक्तिगत हवेली — जो उनकी अपनी संपत्ति थी — श्री मथुराधीश जी के विराजमान होने के लिए समर्पित कर दी। यह हवेली आज भी मंदिर के रूप में विद्यमान है।
  • उन्होंने केवल यह हवेली ही नहीं दी — उनके द्वारा कोटा में तीन और मंदिर भी बनवाए गए।
  • महाराव भीमसिंहजी के समय वे मुख्यमंत्री (माद-उल-मुहम) के पद पर थे — यह मुगल दरबार द्वारा दिया गया उच्च सम्मान था।
एक और ऐतिहासिक सेवा

मुगल सेना के कोटा क्षेत्र से गुजरने की आशंका के समय, जब श्री गोर्धनाथ जी के मंदिर की सुरक्षा की चिंता थी, राजकुमार जगतसिंहजी ने कोटा के अधिकारियों — राय द्वारकादास, विजयराम और चौधरी रणछोड़दास — को विग्रह को सुरक्षित स्थान पर ले जाने का निर्देश दिया था। राय द्वारकादास का नाम इस संदर्भ में भी आता है — जो उनकी धर्म-रक्षा में भूमिका दर्शाता है।

महत्व — कोटा क्यों बना तीर्थ?

श्री मथुराधीश जी के आगमन ने कोटा को एक नई पहचान दी। इससे पहले कोटा मुख्यतः अपनी सैन्य शक्ति और राजनीतिक महत्व के लिए जाना जाता था। लेकिन अब यह वल्लभ संप्रदाय का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया।

नाथद्वारा महोत्सव — और भी बड़ी भक्ति

संवत् 1798 (1741 ई.) में महाराव दुर्जनशालजी ने नाथद्वारा में एक अभूतपूर्व महोत्सव का आयोजन किया। इसमें वल्लभ संप्रदाय के सातों स्वरूप एक साथ प्रतिष्ठित किए गए — जो वैष्णव समाज के लिए एक दुर्लभ आयोजन था।

  • श्री विट्ठलनाथ जी
  • नवनीत प्रिया जी
  • द्वारकानाथ जी
  • गोकुल चंद्र जी
  • मथुरानाथ जी
  • गोकुलनाथ जी
  • मदन मोहन जी

इस महोत्सव में जयपुर के सवाई जयसिंहजी, करौली के राजा गोपालसिंहजी, उदयपुर के महाराणा जगतसिंहजी द्वितीय सहित अनेक राजपरिवारों ने भाग लिया। महाराव दुर्जनशालजी ने लगभग एक लाख रुपये इस उत्सव पर व्यय किए।

मंदिर का ऐतिहासिक महत्व — 1857 की घटना

श्री मथुराधीश जी का मंदिर कोटा की आस्था का केंद्र तो था ही — 1857 के विद्रोह के समय यह मंदिर एक ऐतिहासिक स्थल बन गया।

जब कोटा में विद्रोह की आग फैली और किले की स्थिति गंभीर हो गई, तब दोनों पक्षों ने मथुराधीश जी के मंदिर को ही शांतिवार्ता का स्थान चुना। यहाँ गुसाईं जी की मध्यस्थता में वार्ता हुई। यह उस मंदिर की पवित्रता और सामाजिक स्वीकृति का प्रमाण था।

आज भी जीवंत है यह इतिहास

श्री मथुराधीश जी आज भी उसी हवेली में विराजते हैं — जो दीवान राय द्वारकादास ने लगभग 285 वर्ष पहले भेंट की थी। कोटा आएँ तो इस मंदिर के दर्शन अवश्य करें।

📚 स्रोत एवं संदर्भ

डॉ. मथुरालाल शर्मा — "कोटा राज्य का इतिहास" (मूल हिंदी, तथा अंग्रेजी अनुवाद: डॉ. अरविंद सक्सेना, कोटा विश्वविद्यालय)
अनुभाग: महाराव दुर्जनशालजी का अध्याय — ब्रजनाथ जी एवं मथुराधीशजी
अतिरिक्त: History of Kota State, Second Volume — Administration Reports (संवत् 1795 सन्दर्भ)

Nandgram Dham
Verified Scriptural
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