आबेशे अबश अङ्ग धीरे धीरे चले
प्रेम के आवेश में उनके अंग बेबस थे, और वे धीरे-धीरे चलते थे। भाव में डूबे होने से उनकी आँखें खुल नहीं पाती थीं।
प्राचीन काल में की गई अपनी लीलाओं की अद्भुत कथाएं सुनकर भगवान भूमि पर लोटने लगे और मूर्छित हो गए।
पतित बद्ध जीवों को देखकर वे रो पड़े। वे शांत नहीं रह पाते थे। उनके नेत्रों से कितनी सैकड़ों अश्रु-नदियां प्रवाहित होती थीं?
प्रेमोन्माद के अमृत का आस्वादन करते हुए वे नाचे। उनकी महिमा से पत्थर और काठ भी द्रवित हो उठे।
उन्होंने अपनी सुन्दर भुजाएँ उठाईं, जिन पर रोमांच से रोम-रोम खड़े थे। वे 'हरि! हरि!' पुकारते रहे, और भूमि पर गिरकर लोटने लगे।
साध्वी स्त्रियां हृदय में रो उठीं। उनके नेत्रों से अश्रु बहने लगे। वन के पशु-पक्षी भी रोते-रोते बिलख उठे।
उनके प्रेम-भाव से गृहस्थ लोग भी घर का सुख छोड़ देते हैं। केवल बलराम दास ही इस रस से विमुख रह गया है।
इस भजन के बारे में
- ग्रन्थ
- श्री क्षणदा-गीत-चिन्तामणि
- पद
- 7