भजहू रे मन
भजहू रे मन श्री-नन्द-नन्दन
भजहू रे मन श्री-नन्द-नन्दन
बोडो-कृपा कोइले कृष्ण अधमेर् प्रति
'गौराङ्ग' बोलिते हबे पुलक-शरीर
कदाचित् कालिन्दी-तट-विपिन-सङ्गीतक-रवो
गाय् गोरा मधुर् स्वरे
कृष्णोत्कीर्तन-गान-नर्तन-परौ प्रेमामृताम्भो-निधी
गोपीनाथ मम निबेदन शुनो
जय जय जगन्नाथ शचीर नन्दन्
निताइ-पद-कमल, कोटि-चन्द्र-सुशीतल
उदिलो अरुण पूरब-भागे,
हरि हरि! बिफले जनम गोँआइनु
परम कोरुण, पहू दुइ जन
क्या गाएँ, तय नहीं हो रहा? चक्र घुमाइए और जिस भजन पर रुके, वही गाइए।
॥ आपका भजन ॥
हर भजन का भाव उसी खण्ड से लिया गया है जिसमें स्वयं आचार्य ने उसे रखा था, शब्दों से अनुमान लगाकर नहीं।
भजहू रे मन श्री-नन्द-नन्दन
'गौराङ्ग' बोलिते हबे पुलक-शरीर
गाय् गोरा मधुर् स्वरे
कदाचित् कालिन्दी-तट-विपिन-सङ्गीतक-रवो
गोपीनाथ मम निबेदन शुनो
जय जय जगन्नाथ शचीर नन्दन्
कृष्णोत्कीर्तन-गान-नर्तन-परौ प्रेमामृताम्भो-निधी
निताइ-पद-कमल, कोटि-चन्द्र-सुशीतल
ये भजन गौड़ीय वैष्णव भक्ति-जीवन का हृदय हैं। पाँच शताब्दियों में श्रील भक्तिविनोद ठाकुर, श्रील नरोत्तम दास ठाकुर और श्रील लोचन दास ठाकुर जैसे आचार्यों ने इनकी रचना की। ये हर मन्दिर की आरती में और संसार भर के घरों में गाए जाते हैं।
यहाँ हर भजन देवनागरी लिपि में है, और जहाँ उपलब्ध है वहाँ हर पद का हिन्दी अर्थ और भक्त गायकों की रिकॉर्डिंग भी है। ऑडियो इस्कॉन डिज़ायर ट्री के सौजन्य से चलता है। स्रोत और आभार के बारे में और पढ़ें।