आहा मरि आजु कि आनन्द
आहा! आहा! एकचक्र नगर में कैसा आनंद आया है! हाड़ाई पंडित के घर में भगवान नित्यानंद इस जगत में अवतरित हुए हैं।
बालक भगवान नित्यानंद का शरीर अत्यंत कोमल और सुकुमार है। वह नवनीत अथवा सुवर्ण के समान दमकता है। वह सभी लोकों को मोहित कर लेता है। बालक नित्यानंद के चंद्रमुख को निहारकर पद्मावती और हाड़ाई पंडित अपने हृदय का आनंद संभाल नहीं पाते।
शान्तिपुर में अद्वैत आचार्य आनन्द से गरज उठते हैं। तिल भर समय के लिए भी वे स्थिर नहीं रह पाते। भुजाएँ उठाकर वे नाचते हैं और ताल ठोकते हुए कहते हैं, 'मैं ले आया, मैं वीर बलराम को ले आया!'
ब्रह्मा और देवगण पुष्पों की वर्षा करते हैं। वे निरंतर जय जय की ध्वनि करते हैं। सैकड़ों-सैकड़ों गंधर्व और किन्नर वाद्य बजाते हैं और भगवान नित्यानंद के गुणों के आनंद-सागर की स्तुति में गीत गाते हैं।
भाग्यशाली हाड़ाई ओझा ऐसा पुत्र पाकर धन्य हो गए। लिखकर मैं उनके इस महान् सौभाग्य का वर्णन नहीं कर सकता। कितने ही आनन्दित लोग हाड़ाई ओझा के बड़े घर की ओर दौड़ पड़े!
धन्य है यह पृथ्वी। धन्य है राढ़-देश की भूमि। उस क्षण के नक्षत्र भी शुभ थे। माघ मास की वह शुक्ल-त्रयोदशी भी शुभ थी। नरहरि दास कहते हैं, धन्य है, धन्य है यह कलियुग, क्योंकि अब भगवान नित्यानंद के आने से सब दुख चूर-चूर हो जाएँगे।