अञ्जन गञ्जन लोचन रञ्जन
निताई प्रभु के मनोहर लाल नेत्र सबसे सुंदर काले काजल को भी फीका कर देते हैं। उनकी चाल बड़ी मनोहर है। चलते-चलते वे बार-बार लड़खड़ाते हैं और फिर उठ खड़े होते हैं। वे अपने सुंदर तिरछे नेत्रों से निहारते हैं।
गौर! गौर! पुकारते हुए वे ताली बजाते हैं। उनके कमल-नेत्रों से आँसू बहते हैं। प्रेम में बेसुध होकर वे किसी पतित पापी को देखते हैं, उसे यहाँ आओ, यहाँ आओ कहकर बुलाते हैं और गले लगा लेते हैं।
वे गरजते हैं। वे अपनी छाती पर आघात करते हैं। वे प्रेम के कितने ही भावों को प्रकट करते हैं? उनके शरीर के रोम कदंब-केसर के समान खड़े हो जाते हैं। वे प्रेम की उमंग में उन्मत्त हो जाते हैं।
वे आगम और निगम शास्त्रों से भी परे हैं। वे वेदों की दृष्टि से भी परे हैं। पतित पापियों को वे एक अनमोल उपहार प्रदान करते हैं। आत्माराम दास कहते हैं, मुझे निताई प्रभु की दया का एक कण भी कभी नहीं मिला। इसीलिए मैं पाषाण के समान जड़ बना रह गया।