आरे आरे मोर निता इ चान्द
अरे! अरे! मेरे नित्यानन्द चन्द्र! घर-घर जाकर नित्यानन्द चन्द्र ने लोगों को प्रेमोन्माद के जाल में बाँध लिया।
अपने नेत्रों के कोनों से भगवान् नित्यानन्द ने भौतिक दुःखों की अग्नि में जलते लोगों पर शीतल दृष्टि की वर्षा की।
उन्होंने गौड़ देश को करुणा के अपार सागर में डुबो दिया। प्रेमोन्माद से अभिभूत होकर वे उन्मत्त होकर नाचे।
अपने चरण-कमलों से चलते हुए वे कितनी ही बार डगमगाकर गिरते रहे?
गद्गद स्वर में वे टूटे-टूटे शब्द बोले। उनके नेत्रों से अश्रुओं की उफनती नदियाँ बहने लगीं।
उनके गौर शरीर के रोम कदम्ब के केसर के समान रोमांचित हो उठे।
उनके अंगों पर अनेक प्रकार के आभूषण सुशोभित थे। भक्तों से मिलकर वे परम आनन्द से गाने लगे।
उनकी अत्यन्त करुणा के विषय में सुनकर कृष्ण दास उनके चरणों में गिर पड़ते हैं और उनकी कृपा की भिक्षा माँगते हैं।