अरुण नयन बिबिध भूषण
अरुण नेत्र, विविध आभूषण, सिर पर सुशोभित पगड़ी लिए, हरि हरि पुकारते हुए, दोनों बाहें ऊंची उठाकर चारों दिशाओं में घूम-घूमकर वे नृत्य करते हैं।
गौरवशाली निताई उमंग में नाचते हैं। उनके नेत्र लाल हैं। उनका मुख चन्द्रमा जैसा है। उनमें कितनी माधुरी भरी है?
मत्त गजराज के समान वे सुन्दर चाल से चलते हैं, उनकी पायल छन-छन बजती है। भाव-विभोर होकर उन्हें दिशाओं का भान नहीं रहता, वे 'गौर, गौर' पुकारकर गरज उठते हैं।
उनके चन्द्र-मुख को देखकर भक्तजन भाव-विभोर होकर धरती पर लोटने लगते हैं। सब कोई प्रेम-रस में डूब जाते हैं, केवल दुखी वासुदेव घोष उस रस में नहीं डूब पाते। केवल वे ही वंचित रह जाते हैं।