बड इ दयाल आमार नित्यानन्द राय रे
मेरे नित्यानन्द राय बड़े ही दयालु हैं, रे! वे दीनों के ठाकुर हैं। घर-घर जाकर वे सबसे विनती करके प्रेम-धन बाँटते हैं, रे! वे दुःखी अंधे जीवों का उद्धार करते हैं।
प्रेम के आवेश में वे झूमते-झूमते चलते हैं, रे! जैसे कोई मदिरा पीकर मतवाला हो गया हो। पल-पल में वे रोते हैं, पल-पल में हँसते हैं, रे! अपने भाई के प्रेम में डूबकर वे सुध-बुध खो बैठते हैं।
वे करुणा के सागर हैं, दीनों के बन्धु हैं, निताई दयालु हैं, रे! जिनका कोई सहारा नहीं, उनके वे सहारा हैं, वे प्रेम के दाता हैं। अनन्तदास का हृदय रात-दिन निताई के लाल चरण-कमलों से प्रार्थना करता है, रे।