बन्दे प्रभु नित्यानन्द केबल आनन्द कन्द
मैं भगवान नित्यानन्द को प्रणाम करता हूँ। वे दिव्य आनंद के मूल हैं। वे चमकते आभूषणों से सुसज्जित हैं। उनके कानों में मकर आकार के कुंडल हिलते हैं। उनके गले में कौस्तुभ मणि दमकती है।
उनकी सुन्दर भुजाएँ श्रेष्ठ हाथी की सूँड़ को भी हरा देती हैं। वे सोने की एक शोभामय गदा थामे हैं। उनके अंगों पर केसरिया वस्त्र सजे हैं। वे सिंह की चाल से दौड़ते हैं। उन्हें देखकर असुर और पाषण्डी काँपने लगते हैं।
उनका रंग शुद्ध और उज्ज्वल है। उनके दोनों नेत्र कमल की पंखुड़ियाँ हैं, जिनसे आँसुओं का मधु झरता है। वे मानो सोने का पर्वत हैं, जिससे एक बड़ी गंगा बह रही हो। उन्हें देखकर देवता आनन्द से भर जाते हैं।
उनके शरीर के रोम कदम्ब के केसर की तरह खड़े हो जाते हैं। जब वे उछलते हैं तो धरती काँप उठती है। जब वे वीरता से अपनी छाती पर थाप देते हैं, तो उस ध्वनि से सारे लोक फट जाते हैं। उन्हें देखकर ब्रह्मलोक के निवासी उनकी स्तुति करते हैं।
पतित जीवों को वे सावधानी से चैतन्य-प्रेम का रत्न प्रदान करते हैं। इस प्रकार वे प्रभु को अत्यंत प्रसन्न करते हैं। वृन्दावन दास कहते हैं, अपने ही पूर्वकर्मों के दोष से मैं अब तक निताई के चरण-युगल की भक्ति नहीं कर पाया।