बसुधा जाह्नबा देबी शोभा बिधि, अधिबास भूष भूषित तनु
अधिवास के आभूषणों से सजी देवी वसुधा और जाह्नवा बड़ी शोभा से चमक रही हैं। उनकी सुंदरता जगमगा रही है। वे बिजली, कुंकुम या केतकी के फूलों की तरह चमकती हैं।
चारों दिशाओं से ब्राह्मणगण आशीर्वाद देते हैं। आनंदित हृदय से वे दोनों कन्याओं की ओर देखते हैं। वे वेदों का उच्चारण करते हैं। वे आशीर्वाद के वचन कहते हैं। शुभ दूर्वा घास से वे दोनों कन्याओं के मस्तक को स्पर्श करते हैं।
पंडित की पत्नी के पैर आनन्द से धरती पर नहीं टिकते, उनका हृदय धीरज नहीं रख पाता। सखियाँ मिलकर तरह-तरह के मंगल-कार्य करती हैं और उलु-लुलु की ध्वनि करती हैं। उनके मन में कितनी ही उमंगें भरी हैं!
शंख, घंटियाँ और अनेक वाद्य-यंत्र बजते हैं। एक कोलाहल उठता है, ऐसा कोलाहल जिसकी कोई तुलना नहीं। नरहरि दास कहते हैं, कितनी ही देवांगनाएँ आईं और दूसरों से अनजान, आनंदित हृदय से यह सब दृश्य देखती रहीं?
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