भाबे तरल तनु अनुपम हेम रे
वे भाव-विभोर होकर प्रेमोन्मत्त हैं। उनका रूप स्वर्ण से भी अधिक तेजोमय है। दिन-रात वे उस पुरुष के प्रेम-रस का पान करके अभिभूत रहते हैं, जो वास्तव में उनका ही आत्मस्वरूप है। उनके नेत्रों से प्रेम के सुधामय अश्रु बहते हैं। भुजाएँ उठाकर वे पुकारते हैं, 'हरि! हरि!'
वे गौर किशोर नाच रहे हैं। वे नवद्वीप के नए चन्द्रमा हैं। वे मेरे स्वामी हैं। वे भाव-विभोर हैं। वे प्रेम में काँप उठते हैं। उनका हर अंग कामदेव का बिछाया जाल है।
उनके प्रत्येक अंग पर रोमांचित रोम खिलते हुए नीप के फूलों को भी हरा देते हैं। प्रेम-रस के मधुर सुधा का पान करके वे अभिभूत हैं। गोविन्द दास उनकी महिमा का यह गीत गाते हैं।