भाबेर आबेशे रहु सीता पति मोर पहुं
प्रेम के भाव से भरकर मेरे प्रभु अद्वैत योगासन में बैठे थे। हृदय में भाव के उमड़ने से वे अचानक गरज उठे। वे तुरन्त उठ खड़े हुए।
"मैं उन्हें लाया! मैं उन्हें इस पृथ्वी-मण्डल में लाया! वे समस्त लोकों का उद्धार करेंगे! वे नदिया में अवतरित हुए हैं!" ऐसा कहते हुए अद्वैत प्रभु भुजाएँ उठाकर नृत्य करते हैं।
उनके उन्मत्त नृत्य से धरती काँप उठती है। धरती उनके कदमों का भार सह नहीं पाती। अद्वैत प्रभु के चारों ओर स्त्री-पुरुष भी आनन्द से नाचते हैं। वह स्थान आनन्द का बाज़ार बन गया है।
अद्वैत प्रभु की गर्जना से सातों स्वर्गलोक फट गए। उनकी गर्जना की गूँज परव्योम (आध्यात्मिक आकाश) तक पहुँच गई। अब तीनों लोक जान गए कि महाप्रभु आ गए हैं। अब बलराम दास आनन्द के अपार सागर में तैर रहे हैं।
इस भजन के बारे में
- पद
- 4