Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi
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टेक्स्ट
1 टेक
भज मन सतत ह-इया निर्द्वन्द्व राधा-कृष्ण परम-सुख-दायक रसमय परमानन्द
अर्थ

हे मेरे मन, इस संसार के द्वन्द्वों से मुख मोड़ लो। सदा श्री राधा-कृष्ण की भक्ति करो, जो अमृत के समान मधुर हैं, जो आनन्द से भरे हैं, और जो भक्तों को आनन्द देते हैं।

चञ्चल बिषय-बिष सुख मानि खा-ओसि ना जानसि इह मति मन्द पर-काले निकट मरण-दुःख-देयब बुझह अबहुं करु आन्ध
अर्थ

हे मेरे मन, तुम मूर्ख हो। तुम कुछ भी नहीं जानते। तुम सोचते हो कि इस चंचल सांसारिक भोग के विष का पान करने से हमें सुख मिलेगा। जान लो कि समय के साथ वह विष एक राक्षस बन जाता है। वह पीड़ा और मृत्यु लाता है। वह मनुष्य को अन्धा बना देता है।

मोहे दुःख-भागी करण नह समुचित तो हाम जनम बन्धु निज दुःख जानि अबहुं स्मरण करु यो तुहुं करुणाक सिन्धु
अर्थ

हे मेरे मन, यह उचित नहीं है कि तुम मुझे इस प्रकार दुःख दो। तुम और मैं जन्म से मित्र हैं। यह जानकर कि सांसारिक भोग केवल पीड़ा ही देगा, तुम्हें उनका स्मरण करना चाहिए जो करुणा के सागर हैं।

ओ पद-पङ्कज- प्रेम-सुधा पिबि पिबि दूर कर निज दुःख-कन्द ए राधा-मोहन कह तेजह मिछ-इ मोह यैछन हत निज बन्ध
अर्थ

उनके चरण-कमलों के प्रेम के मधुर अमृत का पान करो, पान करो। उस भोग को दूर फेंक दो जो पीड़ाओं की जड़ बनता है। यह राधामोहन दास कहते हैं, इस संसार के मोह से मुख मोड़ लो, वह मोह जो हमें इस बन्धन में बाँधे रखेगा।