भुबन पाबन निता इ मोर
मेरे निताई प्रभु सारे लोकों को पवित्र करते हैं। वे सदा प्रेम में ऐसे विभोर कैसे रहते हैं? मैं नहीं जानता।
अपनी भुजाएँ उठाकर वे "गौर! गौर!" का जाप करते हैं। मत्त गजराज के समान वे झूमते हुए चलते हैं।
उनके गले में मालती की माला चमकती है, वह माला उनके वक्षस्थल पर खेलती हुई झूलती रहती है।
उनके सुंदर ललित मुख पर एक कोमल मुस्कान है। उनके मुख के चंद्रमा से अमृत की धारा बहती है।
उनके नेत्रों से अश्रुधारा बहती है। उनकी चितवन दया से भरी हुई है।
जो कोई भी अपनी आँखों से उन्हें एक बार देख लेता है, वह प्रेम के सागर में तैरने लगता है।
वे यह भेद नहीं करते कि कौन निर्धन है, कौन पतित है, कौन दुखी है। ऐसा प्रेम का दानी और कौन है? वे हर एक जन को प्रेम-भक्ति का दान देते हैं।
हाय! नरहरि दास ने निताई प्रभु की उपासना नहीं की। इसीलिए नरहरि दास आज सांसारिक जीवन में डूबा हुआ है।