बिमल हेम जिनि तनु अनुपम रे
उनका अनुपम रूप शुद्ध सोने को भी हरा देता है। उनका रूप अनेक प्रकार के फूलों की माला से सजा है। उनके शरीर के रोम खड़े हैं, ऐसे रोम जो कदम्ब के केसर को भी हरा देते हैं। उनके शरीर पर पसीने की बूँद-बूँद झलक रही है।
उनकी मन्थर गति मत्त हाथियों की चाल को भी हरा देती है। प्रेमोन्माद से अभिभूत होकर वे डगमगाते-डगमगाते चलते हैं। उनके गेरुए वस्त्र उदित सूर्य को भी हरा देते हैं। उनके गौर अंग दिव्य लीलाओं की लहरों में क्रीड़ा करते हैं।
भाव में डूबे भगवान् गौरचन्द्र चल नहीं पाते। अब वे बोल भी नहीं पाते, केवल आधे-आधे शब्द बोलते हैं। प्रेम में विभोर होकर वे पुकारते हैं, 'हरि! हरि!' वे सबको, नीच चाण्डाल तक को, अपनी भुजाओं में भर लेते हैं।
हाय! उस आनन्दमय सौभाग्य के समय मैंने भगवान् गौर की उपासना नहीं की। मैंने उनके चरणों को पाने की आकांक्षा नहीं की। इस प्रकार वृन्दावन दास श्रीकृष्ण चैतन्यचन्द्र और ठाकुर श्री नित्यानन्द की महिमा का गान करते हैं।