बिरले वसिया एकेश्वर
एकांत स्थान में बैठकर, भगवान बिना रुके कृष्ण के पवित्र नाम का जाप करते हैं।
वे समस्त अवतारों के शिरोमणि हैं। वे समस्त संन्यासियों के चिंतामणि रत्न हैं।
सुगंधित चंदन का लेप उनके ललाट को सुशोभित करता है। कोई कलंक उन्हें स्पर्श नहीं करता।
स्वप्न में भी रत्न-आभूषण उन्हें स्पर्श नहीं करते।
उन्होंने लक्ष्मी देवी के साथ की लीलाओं से मुख मोड़ लिया है। अब वे एक वृक्ष के नीचे बैठते हैं।
उन्होंने अपनी बाँसुरी और वनमाला त्याग दी है। अब वे संन्यासी का दंड धारण करते हैं।
उन्होंने हँसी-ठिठोली की लीलाओं से मुँह मोड़ लिया है। अब उनके खिले हुए नेत्र-कमलों से आँसू बहते हैं।
अब उनका एकमात्र धन शुद्ध प्रेम का खजाना है। वे उन भक्तों के बीच रहते हैं, जो उसी को अपना एकमात्र धन मानते हैं।
अब वे अपनी आँखों से आँसुओं की वर्षा करते हैं। वासु कहते हैं: अब मेरे प्राण टुकड़े-टुकड़े हो रहे हैं।