चले निताइ प्रेम भरे दिग ठलमल करे
प्रेमोन्माद में डूबे प्रभु निताई चलते हैं। उनके चरणों के भार से पृथ्वी डोलने लगती है। दिशाएं कंपित हो जाती हैं। उनके मुख से अधूरे शब्द निकलते हैं। उनके पार्षद उनकी महिमा का गान करते हैं।
हे भाई, देखो भगवान नित्यानन्द को, जो इस पृथ्वी-मंडल में विचरण कर रहे हैं। अपने भाइयों के मुख देखकर वे आनंद से भर जाते हैं।
वे नीले वस्त्र पहनते हैं। उनकी कटि पर अब कमरबंद नहीं बंधा रहता। प्रेमोन्माद में डूबे वे बाहरी संसार का कुछ भी नहीं जानते। उनका शरीर धूल में लोट जाता है। वे बार-बार 'गौर! गौर!' पुकारते हैं। उन्हें यह भी ज्ञान नहीं रहता कि दिन है या रात।
युग-युग में वे बलराम हैं। वे साधु भक्तों की रक्षा करते हैं और पाषण्डियों का विनाश करते हैं। इस प्रकार वृन्दावन दास श्री कृष्ण चैतन्यचन्द्र और ठाकुर श्री नित्यानन्द की महिमा गाते हैं।