देख देख मोर नित्यानन्द
देखो, देखो मेरे नित्यानन्द को। वे सारे लोकों को मोहित करते हैं, प्रेमानन्द से परिपूर्ण हैं।
मेरे निताईचन्द्र प्रेमानन्द का दान सहज ही करते हैं। एक-एक जन के लिए उन्होंने प्रेम का जाल बिछा दिया है।
निताई सुवर्ण के चम्पा फूल के समान कान्तिमान हैं। उनके सामने खड़े होकर ब्रह्मा भी हाथ जोड़ लेते हैं।
निताई को देखने सब दौड़ पड़ते हैं। निताई सब पर दृष्टि डालते हैं और सबको अपनी छाती से लगाते हैं।
निताई पुकारते हैं, 'बोलो गौर-हरि!' अपनी बाहें ऊंची उठाकर वे प्रेमानन्द में नाचते हैं।
गौर-प्रेम के रस का स्वाद लेते हुए निताई नाचते हैं। हा! राधावल्लभदास उस रस का स्वाद नहीं ले सके, वे उस स्वाद से वंचित ही रह गए।