देख देख सोइ मूरतिमय लेह
देखो! देखो उनके इस दिव्य रूप को! अपने नेत्रों के प्यालों को भरकर, सोने जैसे उज्ज्वल इस रूप की मधुरता का अमृत पी लो!
प्राचीन काल में गोकुल में उनका वर्ण श्याम था; वे मधुर रस की औषधि थे। उनकी सुगन्ध की धारा उमड़कर जगत की युवतियों को उन्मत्त कर देती थी।
प्राचीन काल में वे व्रज की गोरी गोपियों के वक्ष पर आभूषण के समान शोभित थे, इसीलिए अब उनका वर्ण गौर है। अब गौड़ देश में अवतरित होकर वे दिव्य प्रेम के कल्पवृक्ष बन गए हैं।
वे सारे लोकों को आनन्द से भर देते हैं। वे संकीर्तन के धन से धनी हैं। रात-दिन वे प्रेम में मतवाले रहते हैं। अब जन्म-मृत्यु की धधकती दावाग्नि कहाँ रही? अब कलियुग के पाप कहाँ रहे? अब वे हरि-वल्लभ (विश्वनाथ चक्रवर्ती) के सामने प्रकट हैं।