गौराङ्ग करुणा सिन्धु अबतार
गौरांग प्रभु करुणा के सागर हैं। इस संसार में अवतरित होकर उन्होंने अपने ही गुणों की डोरी में अपने पवित्र नामों के चिंतामणि रत्न पिरो दिए। वह माला उन्होंने संसार के लोगों को भेंट कर दी।
यह देखकर कि सभी लोग कलियुग के अँधेरे में खड़े हैं, उन्होंने अपने मुखचन्द्र को सुखद ज्योति से चमका दिया। अपनी दृष्टि से उन्होंने प्रेम-अमृत की भारी वर्षा की। इस प्रकार उन्होंने संसार के लोगों के जलाने वाले दुःख मिटा दिए।
एक-एक हृदय में उन्होंने भक्ति का कल्पतरु वृक्ष लगा दिया। अपने चरण-तल पर शरण देकर उन्होंने इस संसार में भटकते जीवों की कामनाएँ पूर्ण कर दीं।
उन्होंने प्रेम के गजराज से भक्तों को इस संसार से उठवा लिया। इस प्रकार प्रभु ने अपनी लीलाएँ कीं। केवल गोविन्द दास पीछे छूट गए। अब अकेले वे ही बार-बार जन्म और मृत्यु की विष भरी आग में जल रहे हैं।