जय जय अदभुत सो पहुं अद्वैत
अद्भुत अद्वैत प्रभु की जय जय हो! गंगा के तट पर बैठकर वे रोते हैं। उनके नेत्रों से प्रेम के अश्रुओं की नदी बहती है। उनके वस्त्र पसीने से भीग जाते हैं।
अपने स्वामी का ध्यान करते हुए वे गरजते हैं। पैर उठाकर वे उछलते हैं। बाहें उठाकर वे पुकारते हैं। वे रोते हैं और उनका शरीर कांपने लगता है।
अद्वैत प्रभु गरज कर कहते हैं: 'वीरों के राजा कृष्ण गंगा के तट पर आ गए हैं! मेरे प्रेम के वश में होकर वे शीघ्र आ गए हैं! अब वे नदिया में प्रकट हो गए हैं!'
अद्वैत प्रभु की जय हो! उन्हीं के कारण नन्द के पुत्र भगवान कृष्ण इस जगत में आए। वृन्दावन दास कहते हैं: मैं अपने हृदय में अद्वैत प्रभु के चरणों को धारण करता हूँ।