जय जय मदन गोपाल बंशी धारी
जय जय मदन गोपाल की, जो बांसुरी बजाते हैं, जिनका त्रिभंग रूप सौन्दर्य और माधुर्य का धाम है, और जिनके चरण मधुरता के धाम हैं।
जय जय गोविन्द के मनोहर रूप की, जिसकी सुन्दर आभा करोड़ों चन्द्रमाओं को भी परास्त करती है।
जय जय महिमावान, शक्तिशाली गोपीनाथ की, जिनका वक्षस्थल विशाल है और जिनके अंग तमाल वृक्ष के समान श्याम हैं।
जय जय मथुरा-मण्डल की, जो कृष्ण का धाम है! जय जय गोकुल की, जो इस संसार में विख्यात है!
जय जय उन बारह वनों की, जहाँ कृष्ण लीला करते हैं, श्रीवन, लौहवन, भद्रवन और भाण्डीरवन आदि वनों की!
जय महावन की, जहाँ व्रजवासी महान आनन्द प्राप्त करते हैं। वहीं कृष्ण ने अपना स्वरूप इस संसार में प्रकट किया।
जय जय तालवन, खदिरवन और बहुलावन की! जय जय कुमुदवन और काम्यवन की, जहाँ कृष्ण अनेक लीलाएँ करते हैं!
जय जय मधुवन की, जहाँ भगवान मधु पान करते हैं! वहीं बलराम मधु पीकर मत्त हो जाते हैं।
जय जय श्री वृन्दावन की, जो सभी वनों में सर्वश्रेष्ठ है! वह स्थान कामदेव से भी अधिक मोहक है। देवता भी उस स्थान को नहीं समझ सकते।
जय जय ललिता-कुण्ड की! जय श्याम-कुण्ड की! जय जय राधा-कुण्ड की, जो परम गौरवमय है!
जय जय मानस-गंगा की! जय गोवर्धन की! जय जय दान-घाट की, जहाँ भगवान सबसे उत्तम लीलाएँ करते हैं!
जय जय नन्द-घाट की! जय अक्षर-वट की! जय जय चीर-घाट की, जो यमुना के निकट है!
जय जय केशी-घाट की, जो परम मनोहर है! जय वंशी-वट की, जो श्री राधा-कृष्ण के हृदय को आनन्दित करता है!
जय जय राम-घाट की, जो अत्यन्त निर्जन है! वहीं बलराम रास-लीला करते हैं।
जय जय विमल-कुण्ड की! जय नन्दीश्वर की! जय जय पावन-सरोवर की, जहाँ कृष्ण अनेक लीलाएँ करते हैं!
जय जय यावट-ग्राम की, जो अभिमन्यु का घर है! वहाँ राधा और उनकी सखियाँ सदा विराजमान रहती हैं।
जय जय वृषभानु-पुर नामक ग्राम की! जय जय संकेट की, जहाँ राधा-कृष्ण अनेक लीलाएँ करते हैं!
अपने गुरु और वैष्णवों के चरण-कमलों को ही अपना एकमात्र लक्ष्य मानकर, नरोत्तम दास यह नाम-संकीर्तन गाते हैं।