जय जय नित्यानन्द रोहिणी कुमार
जय जय भगवान नित्यानन्द की! वे स्वयं भगवान बलराम हैं। पतितों का उद्धार करने के लिए वे अपनी दोनों भुजाएँ फैलाते हैं।
गद्गद कंठ से बोले उनके अधूरे शब्द सबसे मधुर अमृत हैं। वे जिसे भी देखते हैं, प्रेम की उमंग में उसे गले लगा लेते हैं।
उनके नेत्र सदा चंचल रहते हैं। वे सुनहरे कमलों के बीच मँडराते दो काले भँवरों के समान हैं।
निताई प्रभु दया के ठाकुर हैं। दुखों से पीड़ित लोगों को देखकर वे उनके लिए हरिनाम की माला गूँथते हैं। एक-एक व्यक्ति को वे वह माला प्रदान करते हैं।
अभिमानी पाषण्डियों और पापियों को वे चूर-चूर कर देते हैं। परन्तु दीन-पतित लोगों को वे प्रेम का उपहार देते हैं।
'हाय! हे गौरांग!' पुकारते हुए वे धरती पर गिर पड़ते हैं। उनका सारा शरीर आँसुओं से भीग जाता है।
वृन्दावन दास अपने मन में सोचते हैं, अब भगवान् नित्यानन्द ऐसे लगते हैं मानो सोने का सुमेरु पर्वत धरती पर गिर पड़ा हो।