जय जय सीता पति पहुं मोर
सीता के पति अद्वैत प्रभु की जय जय हो! वे मेरे स्वामी हैं। उनका गौरवशाली रूप सुवर्ण-पर्वत को भी परास्त कर देता है।
भगवान गौर के प्रेम का अमृत पाकर वे निरन्तर आनन्द से उन्मत्त रहते हैं। उनके तेजोमय और भव्य शरीर के रोम सदा पुलकित रहते हैं।
वे प्रेम की उमंग से अभिभूत रहते हैं। उनका शरीर सदा अस्थिर रहता है। उनके नेत्रों से अश्रु स्वर्ग की गंगा की बाढ़ के समान बहते हैं।
वे मधुर मुस्कान देते हैं। उमंग से अभिभूत होकर वे रुक-रुक कर, गद्गद स्वर में बोलते हैं। नाम-जप करते हुए उनके हृदय में कौन-सी उमंग उठती है, यह कोई नहीं जान पाता।
दीन-हीन पतित जनों को देखकर वे उन्हें अपनी बाहों में भर लेते हैं।
वे सबको एक अनुपम रत्न प्रदान करते हैं। केवल घनश्याम दास को वह रत्न नहीं मिला। केवल घनश्याम दास ही अपने पूर्वकर्मों के दोष से उस रत्न से वंचित रह गए।