कनक धराधर मद हर देह
उनका रूप एक मनोहर स्वर्ण पर्वत के समान है। उनका सुनहरा वर्ण कामदेव को भी पराजित कर देता है।
देखो! देखो! अद्भुत भगवान गौर-किशोर को देखो! वे जिस आनन्दमय आध्यात्मिक प्रेम का अनुभव कर रहे हैं, उसकी कोई सीमा नहीं।
उनके शरीर के रोम खड़े हैं। उनकी आँखें दो वर्षाकालीन मेघ हैं। उनका वक्ष देखकर सब आश्चर्य से भर जाते हैं।
एकान्त स्थान में वे भगवान कृष्ण की अनुपम रास-नृत्य लीला के बारे में सुनते हैं। भावविह्वल होकर वे रुँधे गले से टूटे-फूटे शब्द बोलते हैं।
“क्या मैंने अभी मधुर बाँसुरी की ध्वनि सुनी?” ऐसा कहकर वे कान लगाकर ध्यान से सुनते हैं।
फिर अपने साथियों को छोड़कर वे एकान्त स्थान में चले जाते हैं। क्या किसी दिन रामकान्त दास उनसे मिलेगा और उनका संग पाएगा?
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- रामकान्त दास
- पद
- 6