केशेर बेशे भुलिल देशे
उनके बिखरे केश और मधुर मुसकान हैं। उनके चंचल नेत्रों की लहरें सबको, विशेषतः नदिया के निवासियों को, व्याकुल कर देती हैं। वे नदिया में निवास करते हैं।
गौरसुन्दर नाचते हैं। वेदों में भी छिपी हुई उस शुद्ध प्रेम-भक्ति को लेने के लिए वे हर किसी से विनती करते हैं।
वे रोते ही जाते हैं। उनके दोनों नेत्रों से आँसुओं की कितनी ही नदियाँ बाढ़ बनकर बहती हैं! गौर के शरीर के रोम खड़े हो गए हैं। धरती उन्हें सँभाल नहीं पाती।
उनके चरण-कमल अत्यन्त चंचल हैं, उनकी चाल अस्थिर है। अपने कमल-मुख से वे गद्गद स्वर में गीत गाते हैं, कृष्ण की रस-भरी लीलाओं के गीत।
'हा हा' पुकारते हुए वे अपनी बाहें उठाते हैं। वे 'हरि! हरि!' बोलते हैं। ऊँचे स्वर में 'राधा! राधा!' पुकारते हुए वे गदाधर को अपने वक्ष से लगा लेते हैं।