खञ्जन गञ्जन चलन मनोरम
उनकी सुंदर चाल खंजन पक्षियों की सुंदरता को भी लजा देती है। वे बार-बार गिर पड़ते हैं और बार-बार उठ खड़े होते हैं। वे ऊँची गर्जना करते हैं और तिरछी आँखों से निहारते हैं।
वे बादल की गर्जना जैसी वाणी में 'गौर! गौर!' कहकर पुकारते हैं। करतालों से वे बड़ा घोष करते हैं। उनके कमल-नयनों से आँसू बहते हैं। वे प्रेम से अभिभूत हो जाते हैं। पतित पापियों को देखकर वे पुकारते हैं, 'आओ! आओ!' और उन्हें अपनी छाती से लगा लेते हैं।
वे ऊँचे स्वर से गरजते हैं। वे अपनी भुजाओं पर ताल ठोकते हैं। वे भाव के कितने-कितने लक्षण प्रकट करते हैं! उनके पूरे शरीर के रोम कदम्ब के केसर की तरह खड़े हो जाते हैं। वे अपने भाई-भक्तों के प्रेम में मतवाले हैं।
वे आगम और निगम की पहुँच से भी परे हैं। वे वेदों के विधि-विधानों की दृष्टि से भी परे हैं। वे पतित जीवों को महान् दान देते हैं। आत्माराम दास कहते हैं, मैं पत्थर के समान कठोर हूँ। केवल मुझे ही निताई की कृपा का एक अंश भी नहीं मिला।