कि भाबे अद्वैत चान्द अदभुत
अद्वैतचन्द्र किस उमंग से भरे हैं? वे वीरतापूर्वक अद्भुत रूप से उछलते हैं। जब वे गरजते हैं तो पाषण्डी भय से कांप उठते हैं।
ऊँची-ऊँची हंसी हंसते हुए वे कौन-सा मधुर अमृत पाते हैं? ऐसा मधुर अमृत किसी ने कभी नहीं पाया। लाल नेत्रों से वे चारों दिशाओं में देखते हैं। उनके शरीर के रोम पुलकित हो उठते हैं।
अपने मुख से वे भगवान गौर की महिमा का वर्णन करते हैं, ऐसी महिमा जो सारे लोकों को मोहित कर देती है। जिसे भी वे अपनी बाहों में भर लेते हैं, वह प्रेमानन्द में नाचने लगता है।
उनके चरणों की गति से धरती कांप उठती है। उनकी सुकोमल चाल का वर्णन करने के लिए मैं कौन-सी उपमा दूँ? उनकी बाहों का बल शक्तिशाली कलियुग को भी परास्त कर देता है। इस प्रकार घनश्याम दास अद्वैत प्रभु की महिमा का गान करते हैं।