कुन्दन कनया कलेबर कान्ति
उनका शरीर स्वर्ण के समान कांतिमान है। उनके प्रत्येक अंग पर रोमांच से रोम-रोम खड़े हो जाते हैं।
उनके नेत्रों से प्रेमोन्माद के अश्रुओं की दिव्य गंगा बहती है।
देखो! देखो भगवान गौर को! किसने उन्हें यह दिव्य करुणा दी? किसने उन्हें समस्त सद्गुणों के आभूषण पहनाए?
वे स्वयं अपने ही मधुर नामों का जाप करते हैं और दूसरों को भी जाप करवाते हैं। वे स्वयं अपनी महिमा के गीत गाते हैं और दूसरों को भी वे गीत गवाते हैं।
वे नाचते हैं। वे बहरों, गूंगों और अंधों को भी नचा देते हैं। मुझे इन लीलाओं की कोई व्याख्या समझ में नहीं आती।
वे स्वयं आनंद में विभोर हैं। वे समस्त लोकों को भी आनंद में विभोर कर देते हैं। इस विभोरता में कोई नहीं जानता कि वह स्वयं कौन है और दूसरे कौन हैं।
इस संसार के समस्त स्त्री-पुरुष अब दिव्य प्रेम के सागर में तैर रहे और बह रहे हैं। गोविन्द दास कहते हैं: मैं अपना सर्वस्व भगवान गौर को समर्पित करता हूं।