मरि या इ एमन निता इ केन ना भजिनु
मेरा मरना ही अच्छा है। मैंने निताई प्रभु की आराधना नहीं की। हाय! हाय! मैं कितना तुच्छ हूँ! मैं क्या सोच रहा था? मेरे हाथ में अमूल्य धन था, और फिर मैंने उसे खो दिया।
उनके मुखचंद्र में वे आँखें चमकती हैं, जो कमल के फूलों को भी हरा देती हैं, और जो हर जीव को करुणा से निहारती हैं। अपनी बाहें फैलाकर और 'आओ!' कहकर पुकारते हुए, वे पतित जीवों को अपनी छाती से लगा लेते हैं। सबको वे प्रेमोल्लास का धन प्रदान करते हैं।
उनकी कमर पर एक वस्त्र सुंदरता से लिपटा हुआ है। उनके चमकते बाल कुंचित हैं। वे एक सुंदर पगड़ी धारण करते हैं, जो हृदय को मोहित कर लेती है। वे एक सुंदर नर्तक के समान चलते हैं। उनकी छाती पर आँसू बहते हैं। वे बद्ध जीवों के त्रिविध दुखों को दूर कर देते हैं।
'हरिबोल!' वे पुकारते हैं। उनका शरीर दाईं और बाईं ओर झूमता है। उनकी बाहें रामाई और गौरीदास के कंधों पर टिकी हैं। मुस्कान का चंद्रमा उनके मुख पर छाया रहता है। निताई प्रभु ने प्रेम का जाल बिछाया है। वे प्रेमोल्लास की उठती लहरों से इधर-उधर बहते हैं।
निताई प्रभु करुणा के सागर हैं। वे पतित जीवों के एकमात्र मित्र हैं। उन्होंने संपूर्ण ब्रह्मांड को अपनी करुणा के सागर में डुबो दिया है। केवल वे लोग, जो काम से अंधे हैं और भौतिक कामनाओं की रस्सियों से जकड़े हुए हैं, निताई प्रभु की आराधना नहीं करेंगे।