मिलत नहिं ऐसा दुर्लभ जन्म
हे मन, बस सद्गुरु के चरण-कमलों की सेवा करो। शुद्ध भक्त की कृपा पाए बिना किसी में साधना-नियमों का पालन करने की सामर्थ्य नहीं होती। इसलिए हे मेरे प्रिय मन, मैं तुमसे आग्रह करता हूँ, उनकी सेवा करो, पल-पल उनकी सेवा करो।
हे मन, बस सद्गुरु के चरण-कमलों की सेवा करो। पतित जीव चौदह भुवनों में भ्रमण करता रहता है, और उसे मनुष्य जन्म पाने का अवसर बड़ी कठिनाई से मिलता है। अहो! इतने सारे मनुष्यों में से कोई विरला ही हरि के भक्तों के दर्शन का महाभाग्य प्राप्त करता है।
हे मन, बस सद्गुरु के चरण-कमलों की सेवा करो। श्री गुरु कृष्ण की कृपा के आनन्द के साकार रूप हैं, इसलिए वे संसार में दुःख भोगते दीन जीवों के लिए करुणा के भंडार हैं। वे दिव्य ज्ञान, शुद्ध भक्ति और प्रेम, इन तीनों को प्रकट करते हैं। श्री गुरु पतित बद्ध जीवों के उद्धारक हैं।
हे मन, बस सद्गुरु के चरण-कमलों की सेवा करो। श्रुति-शास्त्र, स्मृति-शास्त्र और महान आचार्यों की व्याख्याएँ, सब मिलकर उनकी महिमा का स्पष्ट प्रमाण देते हैं। बस अपना तन, मन और जीवन श्री गुरु के चरणों में अर्पित कर दो, और सदा श्री हरि-नाम जपते रहो।
इस भजन के बारे में
- ग्रन्थ
- वैष्णव आचार्यों के और भजन
- पद
- 4