नाचत रे निता इ बर चान्द
इस जगत के लोगों को प्रेम के अमृत-रस से सींचते हुए, अद्भुत सुंदर नर्तक भगवान निताईचंद्र नाचते हैं।
उनके नाचते चरणों की ताल के साथ उनके मणि-नूपुर बज उठते हैं। सुंदर, चंचल गति से नाचते हुए उनका शरीर हिलता-डुलता है। उनका शरीर प्रेम की तरंगों से जगमगाते मेरु पर्वत के शिखर जैसा कैसे हो गया है?
वे रोते हैं। वे हँसते हैं। वे धीरे-धीरे चलते हैं। हरि! पुकारते हुए वे बेसुध हो जाते हैं। पल-पल वे गौर! गौर! पुकारते हैं। वे दौड़ते हैं। आनंद से वे गरज उठते हैं।
वे बिना रुके संपूर्ण संसार से विनती करते हैं कि वह प्रेम के दुर्लभ रत्न का उपहार स्वीकार कर ले। वे इसे हर व्यक्ति को अर्पित करते हैं। अपने हृदय में वे यह नहीं सोचते कि यह व्यक्ति पापी है, यह लँगड़ा है, यह सबसे नीच है, यह मंदबुद्धि है, यह रोगी है, यह निर्धन है।
बिना माँगे ही वे प्रेम के धन को बाँट देते हैं। इस उपहार से वे सभी दुखों को दूर भगा देते हैं। वे दीन-दुखी लोगों की हर इच्छा पूर्ण करते हैं। वे कमजोर और असहाय लोगों को भी प्रेम की उमंग से भर देते हैं।
निताई प्रभु की करुणामयी दृष्टि पाकर कौन दुर्भाग्यशाली रह सकता है? बलराम दास कहते हैं, हाय! मैं निताई प्रभु की करुणामयी दृष्टि से वंचित रह गया। इसीलिए मेरा हृदय इतना निष्ठुर और कठोर है।