Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi

नाम तत्त्व

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(श्ब् 12.3.51) कलेर् दोष-निधे राजन्न् अस्ति ह्य् एको महान् गुणः कीर्तनाद् एव कृष्णस्य मुक्त-सङ्गः परं व्रजेत्
अर्थ

हे राजन्, यद्यपि कलियुग दोषों का सागर है, तथापि इस युग में एक महान् गुण है, केवल कृष्ण के नाम के कीर्तन से मनुष्य भौतिक बंधन से मुक्त होकर परम दिव्य लोक को प्राप्त हो सकता है।

(श्ब् 11.5.36) कलिं सभाजयन्त्य् आर्या गुण ज्ञाः सार-भागिनः यत्र सङ्कीर्तनेनैव सर्व-स्वार्थो 'भिलभ्यते
अर्थ

जो उन्नत आत्माएँ ज्ञान में वास्तव में आगे बढ़ी हुई हैं, वे इस कलियुग का वास्तविक मूल्य समझकर उसकी प्रशंसा करती हैं, क्योंकि इस पतित युग में केवल संकीर्तन के द्वारा जीवन की समस्त सिद्धि सरलता से प्राप्त हो जाती है।

(श्ब् 12.3.52) कृते यद् ध्यायतो विष्णुं त्रेतायां यजतो मखैः द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद् धरि-कीर्तनात्
अर्थ

सत्ययुग में विष्णु के ध्यान से, त्रेतायुग में यज्ञों के अनुष्ठान से और द्वापरयुग में भगवान् के चरणों की सेवा से जो फल प्राप्त होता था, वही फल कलियुग में केवल हरे कृष्ण महामंत्र के कीर्तन से प्राप्त हो जाता है।

(श्ब् 11.5.37) न ह्य् अतः परमो लाभो देहिनां भ्राम्यताम् इह यतो विन्देत परमां शान्तिं नश्यति संसृतिः
अर्थ

इस भौतिक जगत् में भटकते हुए देहधारी जीवों के लिये संकीर्तन से बढ़कर और कोई श्रेष्ठ प्राप्ति नहीं है, क्योंकि इससे मनुष्य परम शान्ति को प्राप्त करता है और उसका जन्म-मृत्यु का चक्र नष्ट हो जाता है।

(श्ब् 2.1.11) एतन् निर्विद्यमानानाम् इच्छताम् अकुतो-भयम् योगिनां नृप निर्णीतं हरेर् नामानुकीर्तनम्
अर्थ

हे राजन्, महापुरुषों के मार्ग पर चलते हुए भगवान् के पवित्र नाम का निरन्तर कीर्तन करना ही सबके लिए सफलता का निश्चित और निर्भय मार्ग है। यह उनके लिए भी है जो सब भौतिक इच्छाओं से मुक्त हैं, उनके लिए भी जो सब प्रकार के भोग चाहते हैं, और उन योगियों के लिए भी जो दिव्य ज्ञान से आत्म-तृप्त हैं।

(श्ब् 3.33.7) अहो बत श्व-पचो ’तो गरीयान् यज्-जिह्वाग्रे वर्तते नाम तुभ्यम् तेपुस् तपस् ते जुहुवुः सस्नुर् आर्या ब्रह्मानूचुर् नाम गृणन्ति ये ते
अर्थ

आह, कैसी महिमा है उनकी, जिनकी जिह्वा पर आपका पवित्र नाम रहता है! ऐसा व्यक्ति चाण्डाल के घर में जन्मा हो तो भी वह पूजनीय है। हे प्रभु, जो आपका पवित्र नाम जपते हैं, उन्होंने अवश्य ही सब प्रकार की तपस्या की होगी, यज्ञ किये होंगे और आर्यों का सदाचार पा लिया होगा। उन्होंने तीर्थों में स्नान किया होगा, वेदों का अध्ययन किया होगा और सब कुछ पूरा कर लिया होगा।

(श्ब् 8.23.16) मन्त्रतस् तन्त्रतश् छिद्रं देश-कालार्ह-वस्तुतः सर्वं करोति निश्छिद्रम् अनुसङ्कीर्तनं तव
अर्थ

हे प्रभु, मंत्रों के उच्चारण में, विधि-नियमों के पालन में तथा देश, काल, पात्र और सामग्री के विषय में भले ही त्रुटियाँ रह जायँ, परन्तु जब आपके पवित्र नाम का निरन्तर कीर्तन होता है, तब वह इन सब त्रुटियों को दूर करके सब कुछ पूर्ण और त्रुटिरहित बना देता है।

(श्ब् 6.2.14) साङ्केत्यं पारिहास्यं वा स्तोभं हेलनम् एव वा वैकुण्ठ-नाम-ग्रहणम् अशेषाघ-हरं विदुः
अर्थ

भगवान् का पवित्र नाम चाहे किसी और अर्थ में संकेत के रूप में लिया जाय, हास-परिहास में, गीत-वाद्य के मनोरंजन में अथवा उपेक्षा से भी उच्चारित हो, तो भी वह उच्चारण करनेवाले को उसके अनन्त पापों के फल से तुरन्त मुक्त कर देता है। शास्त्रों के सभी अनुभवी विद्वान् इसे स्वीकार करते हैं।

(श्ब् 1.1.14) आपन्नः संसृतिं घोरां यन्-नाम विवशो गृणन् ततः सद्यो विमुच्येत यद् बिभेति स्वयं भयम्
अर्थ

जन्म-मृत्यु के अत्यन्त जटिल चक्र में फँसा हुआ जीव भी यदि अनजाने में ही कृष्ण के उस परम नाम का उच्चारण कर दे, जिससे साक्षात् भय भी डरता है, तो वह उसी क्षण उस चक्र से मुक्त हो जाता है।

(श्ब् 6.2.18) अज्ञानाद् अथवा ज्ञानाद् उत्तमश्लोक-नाम यत् सङ्कीर्तितम् अघं पुंसो दहेद् एधो यथानलः
अर्थ

जिस प्रकार अग्नि सूखी घास को भस्म कर देती है, उसी प्रकार भगवान् का पवित्र नाम, चाहे वह जानते हुए उच्चारित हो या अनजाने में, मनुष्य के समस्त पापों के फल को निश्चय ही भस्म कर देता है।

(श्ब् 12.12.47) पतितः स्खलितश् चार्तः क्षुत्त्वा वा विवशो गृणन् हरये नम इत्य् उच्चैर् मुच्यते सर्व-पातकात्
अर्थ

गिरते समय, फिसलते समय, पीड़ा में अथवा छींकते समय यदि कोई अनजाने में ही ऊँचे स्वर से 'हरि को प्रणाम' पुकार उठे, तो वह अपने समस्त पापों के फल से स्वतः मुक्त हो जाता है।

(श्ब् 12.3.44) यन्-नामधेयं म्रियमाण आतुरः पतन् स्खलन् वा विवशो गृणन् पुमान् विमुक्त-कर्मार्गल उत्तमां गतिं प्राप्नोति यक्ष्यन्ति न तं कलौ जनाः
अर्थ

पीड़ा से त्रस्त, मरणासन्न व्यक्ति यदि गिरते हुए, अस्पष्ट वाणी में और विवशता से भी भगवान् का पवित्र नाम उच्चारित कर दे, तो वह अपने कर्मों के बन्धन से मुक्त होकर परम श्रेष्ठ गति को प्राप्त कर लेता है। फिर भी कलियुग के लोग उस भगवान् की पूजा नहीं करते।

(श्ब् 2.3.24) तद् अश्म-सारं हृदयं बतेदं यद् गृह्यमाणैर् हरि-नाम-धेयैः न विक्रियेताथ यदा विकारो नेत्रे जलं गात्र-रुहेषु हर्षः
अर्थ

जिस हृदय में मन को एकाग्र करके भगवान् के पवित्र नाम का बार-बार उच्चारण करने पर भी न नेत्रों में अश्रु आते हैं और न रोमकूपों में आनन्द का रोमांच होता है, वह हृदय निश्चय ही लौह के समान कठोर है।

(श्ब् 11.2.40) एवं-व्रतः स्व-प्रिय-नाम-कीर्त्या जातानुरागो द्रुत-चित्त उच्चैः हसत्य् अथो रोदिति रौति गायत्य् उन्माद-वन् नृत्यति लोक-बाह्यः
अर्थ

इस प्रकार व्रत लेकर मनुष्य जब भगवान् के अपने अत्यन्त प्रिय नाम का कीर्तन करता है, तब उसमें प्रेम उत्पन्न होने लगता है। हृदय पिघल जाने से वह भक्त कभी ऊँचे स्वर में हँसता है, कभी रोता है, कभी व्याकुल हो उठता है, कभी गाता है और लोक-लाज की चिन्ता किये बिना उन्मत्त की भाँति नाचने लगता है।

(श्ब् 12.13.23) नाम-सङ्कीर्तनं यस्य सर्व-पाप प्रणाशनम् प्रणामो दुःख-शमनस् तं नमामि हरिं परम्
अर्थ

जिनके पवित्र नाम का सामूहिक कीर्तन समस्त पापों का नाश करनेवाला है और जिनको किया गया प्रणाम समस्त दुःखों को शान्त कर देता है, उन परम भगवान् हरि को मैं प्रणाम करता हूँ।

ऑडियो के लिए आभार: इस्कॉन डिज़ायर ट्री। सभी भक्त गायकों की जय।