नाम तत्त्व
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1 रिकॉर्डिंगहे राजन्, यद्यपि कलियुग दोषों का सागर है, तथापि इस युग में एक महान् गुण है, केवल कृष्ण के नाम के कीर्तन से मनुष्य भौतिक बंधन से मुक्त होकर परम दिव्य लोक को प्राप्त हो सकता है।
जो उन्नत आत्माएँ ज्ञान में वास्तव में आगे बढ़ी हुई हैं, वे इस कलियुग का वास्तविक मूल्य समझकर उसकी प्रशंसा करती हैं, क्योंकि इस पतित युग में केवल संकीर्तन के द्वारा जीवन की समस्त सिद्धि सरलता से प्राप्त हो जाती है।
सत्ययुग में विष्णु के ध्यान से, त्रेतायुग में यज्ञों के अनुष्ठान से और द्वापरयुग में भगवान् के चरणों की सेवा से जो फल प्राप्त होता था, वही फल कलियुग में केवल हरे कृष्ण महामंत्र के कीर्तन से प्राप्त हो जाता है।
इस भौतिक जगत् में भटकते हुए देहधारी जीवों के लिये संकीर्तन से बढ़कर और कोई श्रेष्ठ प्राप्ति नहीं है, क्योंकि इससे मनुष्य परम शान्ति को प्राप्त करता है और उसका जन्म-मृत्यु का चक्र नष्ट हो जाता है।
हे राजन्, महापुरुषों के मार्ग पर चलते हुए भगवान् के पवित्र नाम का निरन्तर कीर्तन करना ही सबके लिए सफलता का निश्चित और निर्भय मार्ग है। यह उनके लिए भी है जो सब भौतिक इच्छाओं से मुक्त हैं, उनके लिए भी जो सब प्रकार के भोग चाहते हैं, और उन योगियों के लिए भी जो दिव्य ज्ञान से आत्म-तृप्त हैं।
आह, कैसी महिमा है उनकी, जिनकी जिह्वा पर आपका पवित्र नाम रहता है! ऐसा व्यक्ति चाण्डाल के घर में जन्मा हो तो भी वह पूजनीय है। हे प्रभु, जो आपका पवित्र नाम जपते हैं, उन्होंने अवश्य ही सब प्रकार की तपस्या की होगी, यज्ञ किये होंगे और आर्यों का सदाचार पा लिया होगा। उन्होंने तीर्थों में स्नान किया होगा, वेदों का अध्ययन किया होगा और सब कुछ पूरा कर लिया होगा।
हे प्रभु, मंत्रों के उच्चारण में, विधि-नियमों के पालन में तथा देश, काल, पात्र और सामग्री के विषय में भले ही त्रुटियाँ रह जायँ, परन्तु जब आपके पवित्र नाम का निरन्तर कीर्तन होता है, तब वह इन सब त्रुटियों को दूर करके सब कुछ पूर्ण और त्रुटिरहित बना देता है।
भगवान् का पवित्र नाम चाहे किसी और अर्थ में संकेत के रूप में लिया जाय, हास-परिहास में, गीत-वाद्य के मनोरंजन में अथवा उपेक्षा से भी उच्चारित हो, तो भी वह उच्चारण करनेवाले को उसके अनन्त पापों के फल से तुरन्त मुक्त कर देता है। शास्त्रों के सभी अनुभवी विद्वान् इसे स्वीकार करते हैं।
जन्म-मृत्यु के अत्यन्त जटिल चक्र में फँसा हुआ जीव भी यदि अनजाने में ही कृष्ण के उस परम नाम का उच्चारण कर दे, जिससे साक्षात् भय भी डरता है, तो वह उसी क्षण उस चक्र से मुक्त हो जाता है।
जिस प्रकार अग्नि सूखी घास को भस्म कर देती है, उसी प्रकार भगवान् का पवित्र नाम, चाहे वह जानते हुए उच्चारित हो या अनजाने में, मनुष्य के समस्त पापों के फल को निश्चय ही भस्म कर देता है।
गिरते समय, फिसलते समय, पीड़ा में अथवा छींकते समय यदि कोई अनजाने में ही ऊँचे स्वर से 'हरि को प्रणाम' पुकार उठे, तो वह अपने समस्त पापों के फल से स्वतः मुक्त हो जाता है।
पीड़ा से त्रस्त, मरणासन्न व्यक्ति यदि गिरते हुए, अस्पष्ट वाणी में और विवशता से भी भगवान् का पवित्र नाम उच्चारित कर दे, तो वह अपने कर्मों के बन्धन से मुक्त होकर परम श्रेष्ठ गति को प्राप्त कर लेता है। फिर भी कलियुग के लोग उस भगवान् की पूजा नहीं करते।
जिस हृदय में मन को एकाग्र करके भगवान् के पवित्र नाम का बार-बार उच्चारण करने पर भी न नेत्रों में अश्रु आते हैं और न रोमकूपों में आनन्द का रोमांच होता है, वह हृदय निश्चय ही लौह के समान कठोर है।
इस प्रकार व्रत लेकर मनुष्य जब भगवान् के अपने अत्यन्त प्रिय नाम का कीर्तन करता है, तब उसमें प्रेम उत्पन्न होने लगता है। हृदय पिघल जाने से वह भक्त कभी ऊँचे स्वर में हँसता है, कभी रोता है, कभी व्याकुल हो उठता है, कभी गाता है और लोक-लाज की चिन्ता किये बिना उन्मत्त की भाँति नाचने लगता है।
जिनके पवित्र नाम का सामूहिक कीर्तन समस्त पापों का नाश करनेवाला है और जिनको किया गया प्रणाम समस्त दुःखों को शान्त कर देता है, उन परम भगवान् हरि को मैं प्रणाम करता हूँ।
ऑडियो के लिए आभार: इस्कॉन डिज़ायर ट्री। सभी भक्त गायकों की जय।