निदानेर बन्धु तुमि शुनियाछि हरि
हे हरि, मैंने सुना है कि आप मरणासन्न लोगों के मित्र हैं। मैं पापी हूँ। मैं अत्यन्त दुराचारी हूँ। मुझमें कोई साधना नहीं है, कोई भक्ति नहीं है। अब मैं मृत्यु के निकट हूँ।
मुझ पर भयंकर वृद्धावस्था आ गई है। मेरे दाँत और बाकी सब कुछ जा चुका है। केवल मेरी दुष्ट सांसारिक वासनाएँ नहीं गई हैं। मेरे बाल श्वेत हो गए हैं। फिर भी मैं इस शरीर को सुन्दर वस्त्रों से सजाता हूँ। हे प्रभु, मैं मूर्ख, पागल बन गया हूँ।
मैं जानता हूँ कि यह शरीर मात्र मिट्टी से बना है। कुछ काल तक इस शरीर की मिट्टी इधर-उधर घूमती है, परन्तु अन्त में वह उसी धरती में लौट जाती है जहाँ से आई थी। मैंने कितनी बड़ी भूल की! मैंने सावधानी से इस शरीर पर चन्दन और सुगन्धित तेल का लेप किया।
जो जन्म से अन्धा है, यदि वह किसी गहरे गड्ढे में गिर जाए, तो वह असहाय है। किसी दूसरे को ही उसे बाहर निकालना होगा। इसी प्रकार यदि देखने वाली आँखों वाला व्यक्ति भी इस जन्म-मृत्यु के संसार-कूप में गिर जाए, तो जब तक कोई उसे बचाने न आए, वह डूब जाएगा।
हे हरि, मैं इस जन्म-मृत्यु के संसार में रहने के रोग से पीड़ित हूँ। आपका पवित्र नाम ही इस रोग की औषधि है। यह मैंने शास्त्रों और साधु भक्तों के मुख से सुना है। हे हरि, मैं आपकी शरण लेता हूँ। गोपाल दास को अपने चरणों की नाव प्रदान करें। उस नाव में उसे इस संसार के पार, दूसरे तट तक ले जाएँ।
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