निता इ चान्द दयामय निता इ चान्द दयामय
निताईचन्द्र दयामय हैं, निताईचन्द्र दयामय हैं। कलियुग के जीवों पर जैसी दया वे करते हैं, वैसी दया और कोई नहीं करता।
एक क्षण वे श्याम वर्ण के होते हैं, दूसरे क्षण गौर वर्ण के, तीसरे क्षण पीत वर्ण के। एक क्षण वे हंसते हैं, दूसरे क्षण रोते हैं, तीसरे क्षण मूर्च्छित हो जाते हैं।
फिर वे 'गौर' का नाम भी नहीं ले पाते, केवल 'गों गों' करते हुए विलाप करते हैं। गौर-प्रेम से रंगे उनके अरुण नेत्रों से बहते आंसुओं में वे स्वयं तैरते रहते हैं।
वे स्वयं प्रेम के सागर में तैरते हैं और सारे जगत को भी उस सागर में तैरा देते हैं। केवल यदुदास ही, जो जन्म-मृत्यु के पर्वत पर अटल खड़े रहते हैं, उस सागर से अछूते रह जाते हैं।