निता इ करुणा निधि
निताई प्रभु दया के सागर हैं। विधाता ने उन्हें लाकर हमसे मिला दिया है।
निर्धन, पतित और दुखी लोगों को वे प्रेम का खजाना देते हैं। वे उन्हें उस खजाने से धनवान बना देते हैं।
अपने प्रिय परिकरों से घिरे हुए वे नृत्य-मंडली में नाचते हैं।
वे प्रेम में ऐसे मतवाले कैसे हो गए, मैं नहीं जानता। उन्हें यह भी सुध नहीं रहती कि दिन है या रात।
गौर! गौर! पुकारते हुए वे रोते हैं। उनमें तिल भर भी धीरज नहीं बचता।
उनका शरीर धूल से धूसरित है। उन्हें देखकर कौन शांत रह सकता है?
उनकी महिमा देखकर कौन आनंद में नहीं रो उठेगा? हाय! केवल नरहरि दास ही उस आनंद से दूर रह जाता है।