प्रफुल्लित कनक कमल मुख मण्डल, नयन खण्जन ताहे साजे
उनका मुख-मण्डल खिला हुआ स्वर्ण-कमल है। उनकी आँखें चंचल खंजन पक्षी हैं। उनके चौड़े माथे पर वह तिलक लगा है जो श्रीहरि का मन्दिर है। वे कमण्डलु लिए हैं। उनकी कमर में कौपीन बँधी है।
भगवान गौरचन्द्र की जय हो, जय हो, जो पापों के नाशक हैं, पतितों को पावन करने वाले हैं, लोकों के उद्धारक हैं, और जिन्होंने पवित्र नामों के संकीर्तन का आन्दोलन प्रकट किया!
उनकी शोभायमान भुजाएँ घुटनों तक पहुँचती हैं। उनके गले में मालती की माला इधर-उधर झूलती है। उनका लम्बा-ऊँचा रूप संसार के हृदयों को मोह लेता है। कदम्ब के केसरों की तरह उनके शरीर के रोम आनन्द के भाव में खड़े हो जाते हैं।
उनके चरण-तलों के खिले हुए फूल उगते सूर्य की तरह लाल हैं। वे अद्वैत आचार्य और नित्यानन्द से भिन्न नहीं हैं। उनके चरण-कमलों का मकरन्द विजयानन्द दास को आनन्द के सागर में तैराता है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- विजयानन्द दास
- पद
- 4