प्रेमे मत्त नित्यानन्द सहजे आनन्द कन्द
भगवान् नित्यानन्द आनन्द के मूल हैं। प्रेमानन्द से उन्मत्त होकर वे डगमगाते हुए चलते हैं। वे सब कुछ जानते हैं। वे अपने भाई-भक्तों को प्रेमोन्माद से भर देते हैं, 'हरि!' पुकारते हैं और धरती पर लोट जाते हैं।
भगवान् नित्यानन्द का रूप भगवान् गौर के प्रेमोन्माद से भरा है। अपने भाई-भक्तों के मुख देखकर वे डगमगाकर गिर पड़ते हैं। उनके अश्रुओं की नदियाँ धरती को जलमग्न कर देती हैं।
भगवान् अद्वैत आध्यात्मिक आनन्द के मूल हैं। भगवान् नित्यानन्द के मुख-चन्द्र को देखकर भगवान् अद्वैत आनन्द से गरज उठते हैं। उनके शरीर के रोम रोमांचित हो उठते हैं। वे बार-बार पुकारते हैं, 'हरि! हरिबोल!' वे बार-बार पुकारते हैं, 'गौर! गौर!' वे अपने प्रिय पार्षद भक्तों की महिमा का गान करते हैं।
वे गोलोक के आध्यात्मिक जगत से प्रेम की बाढ़ पृथ्वी पर लाए। वे प्रेम-रस के अनुपम, अपार सागर को लाए। भगवान् नित्यानन्द और भगवान् चैतन्य ने सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को प्रेमोन्माद से भर दिया। अनन्त राय उस प्रेमोन्माद की एक बूँद के लिए भीख माँगते हैं।