पूरबे गोबर्धन धरल अनुज यार
प्राचीन काल में जगत जिन्हें बलराम नाम से पुकारता था, और जिनके छोटे भाई ने गोवर्धन पर्वत उठाया था, वे ही अब भगवान् चैतन्य के साथ संकीर्तन का आनन्द लेने आए हैं। अब उनका नाम नित्यानन्द है।
वे परम उदार हैं। उनका शरीर करुणा से भरा है। वे सब लोकों का मंगल करते हैं। वे सभी गुणों के धाम हैं। गौर-प्रेम के रस में डूबे रहने से उनकी कटि का वस्त्र खिसक जाता है। अवतारों में उनकी कोई बराबरी नहीं है।
वे गाते और नाचते हैं। वे पुकार उठते हैं, 'हरि! हरि!' वे हर क्षण भगवान् गौर और भगवान् गोपाल के चिन्तन में तत्पर रहते हैं। उनके मधुर अधरों पर मुस्कान बनी रहती है। वे परम मधुर वचन बोलते हैं।
वे राम दास के स्वामी हैं। गौरी दास उनके ही गौरवशाली रूप का ध्यान करते हैं, और कुछ नहीं। उन्होंने सम्पूर्ण लोकों को प्रेम-रस के स्वाद से उन्मत्त कर दिया है। इस प्रकार ज्ञान दास भगवान् नित्यानन्द की महिमा का गान करते हैं।