रूपे गुणे अनुपमा लक्ष्मी कोटि मनोरमा
उनका रूप और गुण अनुपम हैं। वे करोड़ों लक्ष्मियों के मन को मोह लेते हैं। वे व्रज में लाखों-लाखों गोपियों के साथ मधुर रास-लीला का आनन्द लेते हैं। वही प्रभु अब अवधूत क्यों बन गए हैं?
अपना यह दुःख भरा विस्मय मैं किससे कहूँ? वे सभी रसिक नायकों के गुरु हैं। वे रस के कल्पतरु हैं। फिर भगवान् निताई ने संन्यास क्यों ले लिया?
शेष और संकर्षण उनके अंश और कला-अवतार हैं। वे हर क्षण गोलोक के आध्यात्मिक जगत में शोभा के साथ विराजमान रहते हैं। शिव और ब्रह्मा भी उन्हें नहीं पा सकते। वे वेदों की पहुँच से भी परे हैं। फिर भगवान् निताई अब संकीर्तन की लीलाओं में क्यों मग्न हैं?
वे भगवान् कृष्ण के बड़े भाई हैं। उनका नाम महाप्रभु बलराम है। परन्तु कलियुग में उनका नाम श्री नित्यानन्द है। उन्होंने संसार के सभी लोगों को भगवान् गौर के प्रेमोन्माद के सुधा-रस में डुबो दिया है। केवल मूर्ख बलराम दास को उन्होंने नहीं डुबाया। केवल बलराम दास ही पीछे रह गए हैं।