सहज इ काञ्चन गोरा
गौर सहज ही सोने जैसे उज्ज्वल हैं। उनकी किशोर अवस्था है, और वे कामदेव से भी अधिक मनोहर हैं।
उस पर उन्होंने श्रेष्ठ नर्तक का वेश धारण किया है। उनके हर अंग में रस का आवेश लहरें ले रहा है।
नवद्वीप के चन्द्रमा नाच रहे हैं। संसार के लोग प्रेम के आनन्द में डूब गए हैं।
उनके शरीर पर घना रोमांच छा गया है। मानो भाव का कदम्ब वृक्ष खिल उठा हो।
उनके नेत्रों से लगातार आँसू बहते हैं। भाव में विभोर होकर वे क्षण में हँसते हैं, क्षण में रोते हैं।
रस से भरकर वे गद्गद स्वर में बोलते हैं। उनके चरणों के स्पर्श से धरती आनन्द की लहरों में झूम उठती है।
उन्होंने संसार के सब लोगों की आशा पूरी कर दी। केवल गोविन्द दास ही वञ्चित रह गया।