नंदग्राम धाम
वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi
ये जन गौराङ्ग भजिते चाय
ये जन गौराङ्ग भजिते चाय
से शरण ल-उक निता-इ-चान्देर
अरुण दु-खानि पाय
अर्थ
जो कोई गौरांग की भक्ति करना चाहता है, उसे पहले निताईचन्द्र के अरुण चरणों की शरण लेनी चाहिए।
निता-इ-चान्देरे ये जन भजे
संसार-तापेर शिरे पद धरि
अमिया सागरे माजे
अर्थ
जन्म-मृत्यु के इस संसार में दुःख भोगता हुआ जो कोई निताईचन्द्र की भक्ति करता है और उनके चरण अपने सिर पर रखता है, वह अमृत के सागर में मग्न हो जाता है।
निता-इ याहा याहा रहिया
ब्रह्मार दुर्लभ प्रेम सुधा-निधि
मानस भरिया पिये
अर्थ
जो कोई निताई की शरण लेता है, उसका हृदय प्रेमामृत के उस सागर से भर जाता है, जिसे ब्रह्मा भी बड़ी कठिनाई से पाते हैं। वह उस सागर के अमृत का पान करता है।
ये निता-इ बलिया कान्दे
ज्ञान दास कहे गौर-पद से-इ
हियार माझरे बान्धे
अर्थ
ज्ञानदास कहते हैं कि जो कोई 'निताई' पुकारकर रोता है, वह गौर के चरणों को सदा अपने हृदय में बांधे रखता है।