अद्वैत गुण मणि अबनी करु धनि
अद्वैत आचार्य गुणों के रत्न हैं। शुद्ध भक्ति के महान धन को मुक्त हाथों से बाँटकर उन्होंने सारे संसार को धनवान बना दिया है। भगवान गौर की महिमा का कीर्तन करते भक्तों से घिरे हुए वे प्रेमानन्द में डूबकर नाचते हैं।
उनकी नित-नई मनोहर भंगिमा कामदेव का अभिमान भी हर लेती है। उनकी चमकती छटा अनुपम है। उनका कोमल शरीर शिरीष के फूल को भी हरा देता है। उनके शरीर के रोम खड़े हो जाते हैं।
उनके ललाट पर तिलक शोभा देता है। उनके गले में मालती की माला और यज्ञोपवीत झूलते रहते हैं। हर नेत्र उन्हें निहारने के लिए लालायित रहता है। अपनी अनुपम बाहों को उठाकर और झूमते हुए वे नाचते हैं। उनके चरणों में कैसी सुन्दर शोभा बसी है!
'गौर-हरि!' वे ऊँचे स्वर से पुकारते हैं। उनके चन्द्र-सम मुख से अमृत बहता है। उनकी करुणा-दृष्टि पाकर कौन-सा पतित पापी शान्त रह सकता है? अद्वैत आचार्य को निहारकर पतित नरहरि दास रो पड़ते हैं।