आगे जनमिल निता इ चान्द
अब भगवान निताईचंद्र ने जन्म लिया है। अब उनकी दया का जाल बिछ गया है।
स्त्रियाँ उन्हें देखने जाती हैं। बालक निताई प्रभु अपनी करुणामय दृष्टि से उन्हें निहारते हैं।
उन्हें देखकर वे घर में नहीं रह पातीं। उनका शोभामय रूप देखने के बाद उनकी आँखों से सदा आँसू बहते रहते हैं।
जब वे उन्हें निहारती हैं, तब उनके हृदय महिमा से भर जाते हैं। वे सोचती हैं, 'अवश्य ही यह कोई महापुरुष है।'
जितना वे उन्हें निहारती हैं, उतनी ही उन्हें देखने की इच्छा उनके हृदय में बढ़ती जाती है। वे इस बात पर तर्क करती हैं कि घर के भीतर जाकर उन्हें देखने की बारी किसकी होगी।
बालक निताई प्रभु उनके नेत्रों का काजल बन गए हैं। वे उनके हृदय को भर देते हैं।
माता ने कितने ही पुण्य कर्म किए होंगे, कि विधाता ने उन्हें ऐसा बालक प्रदान किया?
जब स्त्रियाँ उन्हें निहारती हैं, तब उनकी आँखों से आनंद के अश्रुओं की धाराएँ बहने लगती हैं।
जो भी स्त्री उस बालक को अपनी गोद में लेती है, उसके स्तनों से अचानक दूध बहने लगता है।
वहाँ की स्त्रियाँ प्रेम की उमंग से अभिभूत हो जाती हैं। शिवराम भी उनके साथ जाकर उस बालक भगवान को निहारने की आकांक्षा रखते हैं।