Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi
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टेक्स्ट
आनन्द कन्द निता-इ चान्द अरुण नयान बयान छन्द करु नूपुर सघन झुर हरि हरि बलि बोल रे नटन रङ्ग भकत सङ्ग बिबिध भाष रस-तरङ्ग ईषत् हास मधुर भाष सघने गीम दोल रे
अर्थ

निताईचन्द्र आनन्द के मूल हैं। उनके नेत्र लाल हैं, उनका मुख मनोहर है। उनकी पायल छन-छन बजती है, वे हरि! हरि! पुकारते हैं। भक्तों से घिरे वे नृत्य करते हैं, उनकी वाणी रस की तरंगें हैं। वे मंद-मंद मुस्कुराते हैं, उनके वचन मधुर हैं, उनकी गर्दन झूमती रहती है।

पतित कोर जगत गौर ए दिन रजनी आनन्दे भोर प्रेम-रतन करिया यतन जग-जने करु दान रे कीर्तन माझ रसिक-राज यैछन कनया गिरि बिराज ब्रज-बिहार रस बिथार मधुर मधुर गान रे
अर्थ

वे पतित जीवों को अपनी छाती से लगाते हैं। गौर ही उनके लिए सम्पूर्ण जगत हैं। रात-दिन वे आनन्द में डूबे रहते हैं। जगत के लोगों को वे तत्परता से प्रेमानन्द का दान करते हैं। संकीर्तन में वे रसिकों के राजा हैं, स्वर्ण-पर्वत के समान चमकते हैं, और कृष्ण की व्रज-लीलाओं के मधुर-मधुर गीत गाते हैं।

धूलि धूसर धरणी उपर कबहुं अट्ट-हास रे कबहुं लोटत प्रेमे गर गर कबहुं चलित कबहुं खेलत कबहुं स्वेद कबहुं खेद कबहुं पुलक स्वर अभेद कबहुं लम्फ कबहुं झम्प दीर्घ-श्वास रे
अर्थ

धरती पर गिरकर वे धूल से भर जाते हैं। वे ज़ोर से हँसते हैं। प्रेम में विभोर होकर वे धरती पर लोटते हैं। कभी वे चंचल हो उठते हैं, कभी खेलने लगते हैं। कभी उन्हें पसीना आता है, कभी वे विलाप करते हैं। कभी उनके रोम खड़े हो जाते हैं, कभी वे पुकार उठते हैं। कभी वे उछलते हैं, कभी छिपकर लंबी साँसें भरते हैं।

करुणा सिन्धु अखिल बन्धु कलि-युग-तम-पुलक-इन्दु जगत-लोचन पट-मोचन निता-इ पूरल आश रे अन्ध अधम दीन दुर्जन प्रेम-दाने करल मोचन पा-ओल जगत केबल बञ्चित ए राधा-बल्लभ दास रे
अर्थ

वे करुणा के सागर हैं, सबके मित्र हैं। कलियुग के अंधकार में चमकने वाले चन्द्रमा हैं। वे जगत के लोगों को दृष्टि देते हैं, माया का पर्दा हटा देते हैं। वे सबकी कामनाएं पूर्ण करते हैं। अंधे, पतित, दीन और दुष्ट जीवों को भी वे प्रेमानन्द का दान देते हैं। वे सम्पूर्ण जगत का उद्धार करते हैं, केवल राधावल्लभदास ही उद्धार से वंचित रह गए।