आनन्द कन्द निता इ चान्द
निताईचन्द्र आनन्द के मूल हैं। उनके नेत्र लाल हैं, उनका मुख मनोहर है। उनकी पायल छन-छन बजती है, वे हरि! हरि! पुकारते हैं। भक्तों से घिरे वे नृत्य करते हैं, उनकी वाणी रस की तरंगें हैं। वे मंद-मंद मुस्कुराते हैं, उनके वचन मधुर हैं, उनकी गर्दन झूमती रहती है।
वे पतित जीवों को अपनी छाती से लगाते हैं। गौर ही उनके लिए सम्पूर्ण जगत हैं। रात-दिन वे आनन्द में डूबे रहते हैं। जगत के लोगों को वे तत्परता से प्रेमानन्द का दान करते हैं। संकीर्तन में वे रसिकों के राजा हैं, स्वर्ण-पर्वत के समान चमकते हैं, और कृष्ण की व्रज-लीलाओं के मधुर-मधुर गीत गाते हैं।
धरती पर गिरकर वे धूल से भर जाते हैं। वे ज़ोर से हँसते हैं। प्रेम में विभोर होकर वे धरती पर लोटते हैं। कभी वे चंचल हो उठते हैं, कभी खेलने लगते हैं। कभी उन्हें पसीना आता है, कभी वे विलाप करते हैं। कभी उनके रोम खड़े हो जाते हैं, कभी वे पुकार उठते हैं। कभी वे उछलते हैं, कभी छिपकर लंबी साँसें भरते हैं।
वे करुणा के सागर हैं, सबके मित्र हैं। कलियुग के अंधकार में चमकने वाले चन्द्रमा हैं। वे जगत के लोगों को दृष्टि देते हैं, माया का पर्दा हटा देते हैं। वे सबकी कामनाएं पूर्ण करते हैं। अंधे, पतित, दीन और दुष्ट जीवों को भी वे प्रेमानन्द का दान देते हैं। वे सम्पूर्ण जगत का उद्धार करते हैं, केवल राधावल्लभदास ही उद्धार से वंचित रह गए।