आरे भा इ निता इ आमार दयार अबधि
हे मेरे भाइयो, मेरे प्रभु निताई दया की चरम सीमा हैं। पतित जीवों पर करुणा करके वे जगह-जगह घूमते रहे, और सदा लोगों से विनती करते रहे कि वे प्रेम का महान् धन स्वीकार करें।
भगवान् अद्वैत के संग में वे भगवान् गौर के प्रेम में इतने विभोर हो गए कि खड़े भी नहीं रह पाए। डगमगाते और गिरते-पड़ते चलते हुए उन्होंने भुजाएँ उठाकर 'हरि!' पुकारा। उनके नेत्रों से आँसू बहते रहे।
उनके मस्तक पर तेजोमय तिलक सुशोभित था। उनके कुटिल केशों की लटें इधर-उधर लहराती थीं। उन्होंने गुंजा का मुकुट धारण किया था। उनकी कटि पर एक नीला वस्त्र लिपटा था, ऐसी कटि जो सिंह की पतली कटि को भी हरा देती थी। उनके अरुण चरणों में नूपुर बज रहे थे।
उनका तेजोमय स्वरूप सम्पूर्ण लोकों को मोहित करता है। वे समस्त लोकों को प्रेम-रस में डुबो देते हैं। प्रेमोन्माद से अभिभूत होकर वे ऊँचे स्वर में हँसते हैं। भगवान् नित्यानन्द मेरे स्वामी हैं। वे आनन्द-कन्द हैं। इस प्रकार वृन्दावन दास उनकी महिमा का गान करते हैं।