भुबने जय जय, निता इ दयामय, हरये भब भय, निज गुणे
दयामय निताई प्रभु के जय-जय स्वरों से सारा संसार गूंज उठता है। वे अपने ही गुण से सबका भव-भय हर लेते हैं। पतित और भटके हुए जीवों को वे निरन्तर प्रेम का दान देकर उन्मत्त कर देते हैं।
बाहें उठाकर गौर-हरि पुकारते हुए वे नाचते हैं। वे इधर-उधर झूमते हैं और धरती पर गिर पड़ते हैं। क्या उनका कोमल शरीर सचमुच सोने का पर्वत है? धूल से भरा होने पर भी उनका शरीर बड़ा सुंदर और उज्ज्वल दिखता है।
उनके चंचल नेत्र कमल-दल की शोभा को भी हरा देते हैं। उन नेत्रों से अश्रुओं की धारा बहती रहती है। उनके मुख पर मधुर मुस्कान बनी रहती है, और उस मुस्कान से अमृत की धारा बहती है। उनका मुख वह चन्द्रमा है जो पाप के अन्धकार को मिटा देता है।
प्रेम में विभोर होकर वे थर-थर काँपते हैं। नरहरि दास कब उस प्रेम को समझ पाएँगे? निताई प्रभु को देखकर संसार के सभी चर और अचर जीव दुःख के भारी बोझ से छूट जाते हैं। अब सब आनन्द में तैरते हैं।