बिश्वम्भर मूर्ति येन मदन समान
विश्वंभर का रूप कामदेव के समान भव्य है। उनकी सुगंधित फूल-माला भव्य है। उनके वस्त्र भव्य हैं।
उनके शरीर की कांति के सामने स्वर्ण की चमक भी राख के ढेर के समान तुच्छ है। चंद्रमा भी उनके मुख को देखने में लज्जित हो जाता है।
उनके दाँतों को देखकर मोतियों की माला कहाँ टिकती है? उनके बँधे हुए केश देखकर किसी की सुध-बुध नहीं रहती।
उनके लाल नेत्रों को देखकर कमल के फूल भी अपनी सुधि कैसे बनाए रख सकते हैं?
उनकी दोनों भुजाएं घुटनों तक पहुंचती हैं। उनका वक्षस्थल विशाल है। उनका अत्यंत पतला यज्ञोपवीत भव्य शोभा पाता है।
उनके मस्तक पर अद्भुत सुंदर वैष्णव तिलक शोभायमान हैं। आभूषणों के बिना भी उनके सुंदर अंग सबका हृदय मोह लेते हैं।
करोड़ों रत्न उनके हाथ-पैरों के नाखूनों को निहारते रहते हैं। साक्षात अमृत भी उनकी मुस्कान को निहारता रहता है।
इस प्रकार वृन्दावन दास श्री कृष्ण चैतन्य और श्री नित्यानन्दचंद्र की महिमा का गान करते हैं।