देख अद्वैत गुणेर मणि
देखो अद्वैत आचार्य को, जो गुणों के रत्न से सुशोभित हैं। वे शुद्ध भक्ति के मूल्यवान रत्न को मुक्त हाथों से बाँटते हैं। इस प्रकार वे सारे संसार को भक्ति के धन से समृद्ध कर देते हैं।
उनके शरीर के रोम पुलकित हो उठते हैं। उनका हृदय प्रेम की उमंग से अभिभूत हो जाता है। बाहें उठाकर वे 'गौर! गौर!' कहते हुए नाचते हैं।
उनके नेत्रों से आनन्द के अश्रुओं की धारा बहती है। उनके स्वर्ण-सम चमकते शरीर के रोम पुलकित हो उठते हैं।
उनके मुख से अमृत की धारा बहती है। चारों दिशाओं से सब लोग उनकी सुकोमल भाव-भंगिमा और मधुर-मधुर मुस्कान को निहारते हैं।
अद्वैत आचार्य को चारों ओर से घेरे हुए उनके साथी खोल और करताल बजाते हैं। मधुर स्वर में वे धीरे-धीरे गाते हैं।
उन्हें सुनकर कौन शान्त और स्थिर रह सकता है? दीन पापी भी अब आनन्द से उन्मत्त हो जाते हैं। यह सब देखकर नरहरि दास समझ नहीं पाते कि यह सब कैसे हो रहा है। वे पूर्णतः चकित रह जाते हैं।