एमन निता इ कोथा ओ देखि ना इ
निताई जैसा मैंने कहीं कोई नहीं देखा। अवधूत का वेश धारण कर वे लोगों को भगवान कृष्ण के पवित्र नाम देते हैं। हे भाइयो, वे हँसते हैं, रोते हैं और नाचते हैं।
वे अद्वैत आचार्य के साथ लीलाएं करते हैं। उनके शरीर में अब शांति शेष नहीं रहती। भगवान गौर के प्रति प्रेमोन्माद से उनका शरीर अभिभूत हो जाता है। डगमगाते-डगमगाते वे चलते हैं। भुजाएं उठाकर वे 'हरि!' पुकारते हैं। प्रभु निताई के नेत्रों से अश्रु बहते हैं।
उनके मस्तक पर तिलक सुंदर शोभा देता है। उनके कुंचित केश इधर-उधर लहराते हैं। वे गुंजा के मुकुट धारण करते हैं। उनकी कटि सिंह की कटि को भी पराजित करती है। उनकी कमर पर नीले वस्त्र बंधे रहते हैं। उनके लाल चरणों में नूपुर की झंकार होती है।
प्रभु निताई की महिमा का वर्णन कौन कर सकता है? बद्ध जीवों को देखकर वे करुणा से भर जाते हैं। भगवान हरि के पवित्र नाम प्रदान कर उन्होंने समस्त लोकों का उद्धार किया है। केवल वे लोग, जो भौतिक इंद्रिय-सुखों की रस्सियों में बंधे हैं और कामवासना से अंधे हो गए हैं, प्रभु निताई की भक्ति करने में असमर्थ रहते हैं।